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इजरायली चुनाव: जनसंहार, रंगभेद और सेटलर उपनिवेशवाद के पक्ष में एक और जनादेश

इजरायली चुनाव: जनसंहार, रंगभेद और सेटलर उपनिवेशवाद के पक्ष में एक और जनादेश

- मनमोहन

अक्तूबर 2026 के इन आखिरी दिनों में, जब गजा में जारी जनसंहार को तीन साल से ज्यादा हो चुके हैं, इजरायल के मतदाताओं ने एक बार फिर साबित किया है कि फिलिस्तीनियों के खिलाफ उसकी नस्लवादी और औपनिवेशिक नीतियां किसी एक नेता की निजी पसंद नहीं हैं. वे उस राज्य की बुनियाद हैं.

आंकड़ों पर नजर डालिए. अंतिम नतीजों में नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं और आइजेनकोट की अगुवाई वाले विपक्ष को 48. अरब नागरिकों की पार्टियों, यानी संयुक्त सूची (जाॅइंट लिस्ट) और राअम, को कुल 19 सीटें मिली हैं. किसी के पास 61 की बहुमत संख्या नहीं है. यानी सरकार बनाने की चाबी इन्हीं फिलिस्तीनी प्रतिनिधियों के हाथ में है. फिर भी विपक्ष का प्रभावशाली हिस्सा उनके साथ साझेदारी से कतरा रहा है. इसलिए इस चुनाव को अगर कोई एक नाम दिया जा सकता है, तो वह यही है: फिलिस्तीनियों के खिलाफ जारी समूल विनाश और रंगभेद के पक्ष में दिया गया एक और जनादेश.

जनसंहारक सर्वसम्मति

इजरायल के प्रमुख मानवाधिकार संगठन बीश्त्सेलेम (B’Tselem) ने गजा की तबाही को ‘गजा में होलोकाॅस्ट’ कहा है. इजरायली राजनीति को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि वहां की जायोनी पार्टियां चाहे आर्थिक, सामाजिक या वैचारिक सवालों पर कितना भी लड़ें, फिलिस्तीनियों के औपनिवेशिक दमन की बुनियादी नीतियों पर उनके बीच एक खौफनाक और अटूट सहमति है. इस सेटलर उपनिवेशवादी सत्ता को चलाने का तरीका क्या हो, न्यायपालिका कितनी स्वतंत्र रहे, या धुर-कट्टरपंथी यहूदियों पर अनिवार्य सैन्य सेवा और करों का बोझ डाला जाए या नहीं, इन घरेलू सवालों पर वे एक-दूसरे से भिड़ सकती हैं. लेकिन फिलिस्तीनियों के अस्तित्व को मिटाने वाली जनसंहारक नीतियों पर वे एक सुर में खड़ी हैं.

पश्चिमी मीडिया और कूटनीतिक हलके इजरायली विपक्ष पर ‘उदारवादी’ और ‘मध्यमार्गी’ का लेबल चिपकाते रहे हैं. जमीनी सच्चाई इससे उलट है.

विपक्ष के दक्षिणपंथी छोर पर जनरल गादी आइजेनकोट हैं. गजा के जनसंहार के दौरान वे आठ महीने नेतन्याहू की युद्ध-सरकार का हिस्सा रहे. वे फिलिस्तीनी राज्य के कट्टर विरोधी हैं और सेना के कुख्यात ‘दहिया सिद्धांत’ के मुख्य रणनीतिकारों में गिने जाते हैं, जो आम नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढांचे के खिलाफ जरूरत से कहीं ज्यादा, असमान ताकत के इस्तेमाल की वकालत करता है.

दूसरी तरफ विपक्ष के तथाकथित ‘वामपंथी जायोनिस्ट’ छोर पर ‘डेमोक्रेट्स’ के नेता जनरल याईर गोलान हैं. 13 अक्तूबर 2023 के एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि सबसे पहले गजा की बिजली के सारे स्विच बंद कर दिए जाएं, इस लड़ाई में किसी भी मानवीय सहायता की इजाजत नहीं होनी चाहिए, और जब तक बंधक रिहा नहीं होते, गजा के लोग भूख से मर सकते हैं, यह ‘पूरी तरह जायज’ है. जनसंहार के सबसे क्रूर तरीकों की ऐसी खुली वकालत करने वाला नेता इजरायली विपक्ष की ‘वामपंथी’ पहचान है.

इसी आम सहमति को देखकर बीश्त्सेलेम ने चेतावनी दी कि गजा में जो हो रहा है, उसे सिर्फ मौजूदा फासीवादी नेताओं की मर्जी कहकर खारिज नहीं किया जा सकता. उसके मुताबिक हम इजरायली समाज के नाजीकरण का अंतिम चरण देख रहे हैं.

चुनाव से ठीक एक दिन पहले संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट जारी की. उसमें कहा गया कि अक्तूबर 2025 के तथाकथित ‘युद्धविराम’ के बावजूद इजरायल ने 2026 में भी जनसंहार और मानवता के खिलाफ अपराध जारी रखे. आयोग ने यह भी दर्ज किया कि वेस्ट बैंक में हवाई हमलों में मारे गए फिलिस्तीनियों की संख्या, जो 2008 से 6 अक्तूबर 2023 के बीच छह थी, 7 अक्तूबर 2023 से 30 सितंबर 2026 के बीच 254 हो गई. पश्चिमी सरकारों और उनके मुख्यधारा मीडिया ने इस रिपोर्ट को जानबूझकर अनदेखा किया. उनकी हताश कोशिश साफ दिखती है. वे इस ‘जनसंहारक सर्वसम्मति’ पर पर्दा डालना चाहते हैं. वे रंगभेदी इजरायल का अंतरराष्ट्रीय पुनर्वास करके उसे दोबारा ‘लोकतंत्र’ बनाकर पेश करना चाहते हैं. और वे सारे अपराधों का ठीकरा अकेले नेतन्याहू के सिर फोड़कर यह भ्रम फैलाना चाहते हैं कि उनके जाते ही समस्या खत्म हो जाएगी.


इतिहास गवाह है

पश्चिम के इस भ्रम को तोड़ने के लिए इतिहास देखना होगा. पहले बहुत से फिलिस्तीनी और अरब इजरायली चुनावों पर इसलिए नजर रखते थे कि सबसे बुरे हालात को टाला जा सके. दशकों के लहूलुहान तजुर्बे ने साफ कर दिया कि फिलिस्तीन के सवाल पर तमाम जायोनी नेता बुनियादी तौर पर एक जैसे हैं. आधिकारिक आंकड़े यही कहते हैं.

1990 के दशक की बहुप्रचारित ‘ओस्लो शांति प्रक्रिया’ के दौर में यित्जाक राबिन प्रधानमंत्री थे और पश्चिम उन्हें शांति का दूत कहता था. फिलिस्तीनी केंद्रीय सांख्यिकी ब्यूरो (PCBS) के मुताबिक 1992 से 1995 के बीच पश्चिमी तट में, पूर्वी यरूशलेम को छोड़कर, अवैध इजरायली बसने वालों की संख्या 1,11,673 से बढ़कर 1,40,235 हो गई. यानी शांति वार्ता के बीचोंबीच 25 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी.

लेबर पार्टी के ही एहुद बराक की सरकार ने सत्ता में आने के पहले छह महीनों में बस्तियों में 3,196 नए मकानों के टेंडर जारी कर दिए, जो नेतन्याहू के पिछले कार्यकाल के सालाना औसत से भी ज्यादा थे.

जून 2021 में नफ्ताली बेनेट और याईर लापिद ने नेतन्याहू को हटाकर गठबंधन सरकार बनाई, जिसे पश्चिमी मीडिया ने ‘नया सवेरा’ बताया. इजरायली संस्था पीस नाउ के आंकड़ों के अनुसार इस सरकार ने पहले ही साल में 7,292 आवासीय इकाइयों की योजनाएं आगे बढ़ाईं, जो नेतन्याहू के सालाना औसत से 26 प्रतिशत ज्यादा थीं.

पिछले तीन साल में जब दुनिया की नजर गजा में जारी जनसंहार पर है, वेस्ट  बैंक में जातीय सफाया ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया. फिलिस्तीनी केंद्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार 2025 के अंत तक वेस्ट बैंक में अवैध इजरायली ठिकानों की संख्या 645 हो चुकी थी. फिलिस्तीनी प्राधिकरण से जुड़े उपनिवेशीकरण और दीवार प्रतिरोध आयोग के मुताबिक अक्तूबर 2023 से अगस्त 2026 के बीच लगभग 29,335 दुनम फिलिस्तीनी जमीन हड़पी गई. 2025 में इजरायली फौज और अवैध तौर बसने वालों ने फिलिस्तीनियों पर 23,827 हमले किए, और 2026 के शुरुआती सात महीनों में इन हमलों में पिछले साल की इसी अवधि से 63 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई. इस हिंसा का मकसद सोचा-समझा औपनिवेशिक है: फिलिस्तीनी किसानों की जमीन पर कब्जा करना और हर प्रतिरोध को फौजी बूटों तले कुचल देना.

अस्तित्व की जंग

इस चुनाव में सबसे अहम भूमिका उन फिलिस्तीनियों की रही जिन्हें रंगभेदी इजरायल में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखा गया है. बेजालेल स्मोट्रिच जैसे नेता गलील और नेगेव (नकब) को ‘यहूदी आबादी वाला इलाका’ बनाने और फिलिस्तीनियों को बेदखल करने की खुली बात करते रहे हैं. इस अस्तित्वगत खतरे को भांपकर फिलिस्तीनी नागरिक बड़ी संख्या में वोट डालने निकले, यहां तक कि दशकों से चुनाव का बहिष्कार करने वाले भी.

पर लोकतंत्र की असलियत चुनाव से पहले ही दिख गई थी. केंद्रीय चुनाव समिति ने बलद पार्टी के नेता सामी अबू शेहादेह को एक लेख के आधार पर चुनाव लड़ने से रोकने का फैसला किया और दोनों प्रमुख अरब सूचियों को भी अयोग्य ठहराया. सुप्रीम कोर्ट ने सूचियों को बहाल किया, मगर अबू शेहादेह को अयोग्यता के फैसले की चेतावनी देकर नाम वापस लेने को मजबूर कर दिया. यह उस समाज की हालत है जिसमें एक आम फिलिस्तीनी नागरिक खुद को ‘बीसवें दर्जे का नागरिक’ महसूस करता है.

किसी सचमुच के लोकतंत्र में, जहां अरब पार्टियां 19 सीटें जीतकर निर्णायक भूमिका में हों, वे सरकार बनाने का दावा पेश करतीं. पर इजरायल लोकतंत्र नहीं, सेटलर औपनिवेशिक राज्य है. आइजेनकोट समेत तमाम ‘उदारवादी’ जायोनी नेता साफ कह चुके हैं कि वे अरब पार्टियों के सहारे सत्ता में नहीं आएंगे. वजह वही पुरानी है: यहूदी राज्य को अरबों के हाथ में नहीं दिया जा सकता.

सेटलर आतंकवाद का उभार

नेतन्याहू ट्रंप या बोल्सोनारो की तरह हार आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे, ऐसी आशंका जताई जा रही है, और वे सत्ता में बने रहने के लिए कोई भी हथकंडा अपना सकते हैं. चुनाव से पहले उन पर ईरान के साथ तनाव भड़काने और डर का माहौल बनाने के आरोप लगे. उनकी असली चिंता सिर्फ भ्रष्टाचार के मुकदमे नहीं हैं. वे कब्जे वाले पश्चिमी तट को, जिसे वे ‘यहूदिया और सामरिया’ कहते हैं, हमेशा के लिए इजरायल में मिलाकर ‘ग्रेटर इजरायल’ की दिशा में बढ़ना चाहते हैं.

दूसरी ओर इतामार बेन-ग्विर और स्मोट्रिच अब सिर्फ राजनेता नहीं हैं. उनके पास हथियारबंद गिरोहों का सहारा है. 7 अक्तूबर के बाद बेन-ग्विर ने लाखों बंदूक लाइसेंसों की प्रक्रिया आगे बढ़ाई, मार्च 2024 तक वे खुद एक लाख लाइसेंस पर जश्न मना चुके थे, और बाद में बस्तियों और दूसरे इलाकों को लाइसेंस-पात्र सूची में जोड़ते गए. अमेरिका में जहां नौजवान ‘फ्री फिलिस्तीन’ की बात कर रहे हैं, वहीं इजरायल के युवा मतदाता धुर-कट्टरपंथ की तरफ झुक रहे हैं. सर्वेक्षणों के मुताबिक अगर नतीजा सिर्फ नौजवानों के वोट से तय होता, तो बेन-ग्विर और स्मोट्रिच की पार्टियों को लगभग 29 सीटें मिलतीं. इजरायल के भीतर यहूदियों के बीच बढ़ती दरारों के गृहयुद्ध का रूप लेने की चेतावनियां अतिशयोक्ति नहीं हैं. आइजेनकोट जैसा कोई नेता सरकार बनाने की कोशिश करे, तो उसे इन हथियारबंद सेटलर गिरोहों से सीधे टकराना पड़ेगा.

इस चुनाव से फिलिस्तीनियों के लिए कुछ नहीं बदलेगा. वे गजा के मलबे में अपनों को तलाशते रहेंगे, भूख से जूझते रहेंगे, और वेस्ट बैंक में सेटलरों के आतंक का शिकार होते रहेंगे. चाहे वे रंगभेदी इजरायल के नागरिक हों, कब्जे में रह रहे हों या निर्वासन में, इस सत्ता का बाहरी चेहरा बदलने से बहुत कम फर्क पड़ेगा. उसकी जनसंहारक औपनिवेशिक संरचनाएं जस की तस रहेंगी.

साम्राज्यवाद की प्रयोगशाला

आज इजरायल आधुनिक साम्राज्यवाद की ‘वैश्विक प्रयोगशाला’ है. गजा और पश्चिमी तट के निहत्थे लोगों पर जिन ड्रोन हमलों, एआई से चलने वाले मारक तंत्रों और बायोमेट्रिक निगरानी को आजमाया जाता है, उन्हें बाद में ‘युद्ध में परखे हुए’ का तमगा लगाकर दुनिया भर की तानाशाह सरकारों को बेचा जाता है.

जब साम्राज्यवादी देश इजरायल को अरबों डाॅलर के हथियार देते हैं, तो वे असल में अपने ही देशों में लोकतांत्रिक अधिकार कुचलने और वैश्विक दक्षिण के संसाधन हड़पने के औजारों में निवेश करते हैं. आज यूरोप से अमेरिका तक मेहनतकश जनता महंगाई और टूटते अस्पतालों के खिलाफ सड़कों पर है. उसे दिख रहा है कि कल्याणकारी बजट काटकर जिन युद्धों में झोंका जा रहा है, उसकी बड़ी धुरी यही जायोनी-साम्राज्यवादी गठजोड़ है. इजरायल के लाइवस्ट्रीम किए गए जनसंहार से बेलगाम होकर अमेरिका और पश्चिम 19वीं सदी की तर्ज पर नंगे औपनिवेशिक कब्जे और संसाधनों की लूट को दोबारा जिंदा कर रहे हैं.

आगे का रास्ता

इसलिए दुनिया के किसी भी मंच पर जनसंहार करने वाले इजरायल को वैधता और पुनर्वास नहीं होने दिया जा सकता.

इजरायल के खिलाफ बहिष्कार, विनिवेश और प्रतिबंध के आंदोलन को तेज करना आज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, ताकि उसकी रंगभेदी सत्ता को उसी तरह अलग-थलग किया जा सके, जैसे कभी रंगभेदी दक्षिण अफ्रीका को किया गया था. इजरायल की दमनकारी और औपनिवेशिक सत्ता सिर्फ फिलिस्तीनियों के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए खतरा है.

इसके खिलाफ वैश्विक प्रतिरोध के केंद्र में फिलिस्तीन की आजादी का सवाल है. दुनिया भर में लाखों लोग नारा लगाते रहे हैं: “फिलिस्तीन की आजादी, हम सबकी आजादी.” एक बेहतर, न्यायपूर्ण और आजाद दुनिया सचमुच मुमकिन है, और उस दुनिया के निर्माण के केंद्र में आज फिलिस्तीन की आजादी का संघर्ष खड़ा है. जनसंहार को रोकना, रंगभेदी व्यवस्था को ध्वस्त करना और उसके तमाम अपराधी साझेदारों की जवाबदेही तय करना आज के दौर की सबसे बुनियादी जिम्मेदारी है.


07 November, 2026